Monday, August 22, 2011

॥ मनोवांछित फलप्राप्ति हेतु कृष्ण-मंत्र ॥

॥ मनोवांछित फलप्राप्ति हेतु कृष्ण-मंत्र ॥


जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर श्रीकृष्ण के विभिन्न मंत्र दिए जा रहे हैं। इन मंत्रों के जाप से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। शुभ प्रभाव बढ़ाने व सुख प्रदान करने में ये मंत्र अत्यन्त प्रभावी माने जाते हैं। पाठकों की सुविधा के लिए मंत्र से संबंधित जानकारी भी यहाँ दी गई है।

भगवान श्रीकृष्ण का मूलमंत्र :
'
कृं कृष्णाय नमः'
यह श्रीकृष्ण का मूलमंत्र है। इस मूलमंत्र का जाप अपना सुख चाहने वाले प्रत्येक मनुष्य को प्रातःकाल नित्यक्रिया व स्नानादि के पश्चात एक सौ आठ बार करना चाहिए। ऐसा करने वाले मनुष्य सभी बाधाओं एवं कष्टों से सदैव मुक्त रहते हैं।

सप्तदशाक्षर श्रीकृष्णमहामन्त्र :
'
ऊँ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा'
यह श्रीकृष्ण का सप्तदशाक्षर महामंत्र है। इस मंत्र का पाँच लाख जाप करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। जप के समय हवन का दशांश अभिषेक का दशांश तर्पण तथा तर्पण का दशांश मार्जन करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है। जिस व्यक्ति को यह मंत्र सिद्ध हो जाता है उसे सबकुछ प्राप्त हो जाता है।

सात अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :
'
गोवल्लभाय स्वाहा'
इस सात(7) अक्षरों वाले श्रीकृष्ण मंत्र का जाप जो भी साधक करता है उसे संपूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

आठ अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
गोकुल नाथाय नमः'
इस आठ(8) अक्षरों वाले श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक जाप करता है उसकी सभी इच्छाएँ व अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं।

दशाक्षर श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलांगाय नमः'
यह दशाक्षर(10) मन्त्र श्रीकृष्ण का है। इसका जो भी साधक जाप करता है उसे संपूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

द्वादशाक्षर श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय'
इस कृष्ण द्वादशाक्षर(12) मन्त्र का जो भी साधक जाप करता है, उसे इष्ट सिद्धी की प्राप्ति हो जाती है।

बाईस अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र :
'
ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविंदाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ॥
यह बाईस(22) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण का मंत्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसे वागीशत्व की प्राप्ति होती है।

तेईस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय श्रीं श्रीं श्री'
यह तेईस(23) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण का मंत्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसकी सभी बाधाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

अट्ठाईस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
ॐ नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'
यह अट्ठाईस(28) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसको समस्त अभिष्ट वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

उन्तीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड बालरूप मेघश्याम भगवन विष्णो स्वाहा।'
यह उन्तीस(29) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। इस श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक एक लाख जप और घी, शकर तथा शहद में तिल व अक्षत को मिलाकर होम करते हैं, उन्हें स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

बत्तीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'नन्दपुत्राय श्यामलांगाय बालवपुषे कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।'
यह बत्तीस(32) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। इस श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक एक लाख बार जाप करता है तथा पायस, दुग्ध व शकर से निर्मित खीर द्वारा दशांश हवन करता है उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।


तैंतीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'ॐ कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे। रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे॥'
यह तैंतीस(33) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। इस श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक जाप करता है उसे समस्त प्रकार की विद्याएं निःसंदेह प्राप्त होती हैं।

कृष्ण स्मरण का महत्व

कृष्ण स्मरण का महत्व
 श्री शुकदेवजी राजा परीक्षित्‌ से कहते हैं-

सकृन्मनः कृष्णापदारविन्दयोर्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह।
न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्‌ स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः
 
जो मनुष्य केवल एक बार श्रीकृष्ण के गुणों में प्रेम करने वाले अपने चित्त को श्रीकृष्ण के चरण कमलों में लगा देते हैं, वे पापों से छूट जाते हैं, फिर उन्हें पाश हाथ में लिए हुए यमदूतों के दर्शन स्वप्न में भी नहीं होते।

अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः
क्षिणोत्यभद्रणि शमं तनोति च।
सत्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं
ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम्‌
 
श्रीकृष्ण के चरण कमलों का स्मरण सदा बना रहे तो उसी से पापों का नाश, कल्याण की प्राप्ति, अन्तः करण की शुद्धि, परमात्मा की भक्ति और वैराग्ययुक्त ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति आप ही हो जाती है।

पुंसां कलिकृतान्दोषान्द्रव्यदेशात्मसंभवान्‌।
सर्वान्हरित चित्तस्थो भगवान्पुरुषोत्तमः
 
भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जब चित्त में विराजते हैं, तब उनके प्रभाव से कलियुग के सारे पाप और द्रव्य, देश तथा आत्मा के दोष नष्ट हो जाते हैं।

शय्यासनाटनालाप्रीडास्नानादिकर्मसु।
न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः
 
श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व समझने वाले भक्त श्रीकृष्ण में इतने तन्मय रहते थे कि सोते, बैठते, घूमते, फिरते, बातचीत करते, खेलते, स्नान करते और भोजन आदि करते समय उन्हें अपनी सुधि ही नहीं रहती थी।

वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र-
शाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः।
ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ
तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम्‌
 
जब शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रक आदि राजा वैरभाव से ही खाते, पीते, सोते, उठते, बैठते हर वक्त श्री हरि की चाल, उनकी चितवन आदि का चिन्तन करने के कारण मुक्त हो गए, तो फिर जिनका चित्त श्री कृष्ण में अनन्य भाव से लग रहा है, उन विरक्त भक्तों के मुक्त होने में तो संदेह ही क्या है?

एनः पूर्वकृतं यत्तद्राजानः कृष्णवैरिणः।
जहुस्त्वन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा
 
श्रीकृष्ण से द्वेष करने वाले समस्त नरपतिगण अन्त में श्री भगवान के स्मरण के प्रभाव से पूर्व संचित पापों को नष्ट कर वैसे ही भगवद्रूप हो जाते हैं, जैसे पेशस्कृत के ध्यान से कीड़ा तद्रूप हो जाता है, अतएव श्रीकृष्ण का स्मरण सदा करते रहना चाहिए।

श्रीकृष्णाष्टकम्‌ - Krishnashtakam

श्रीकृष्णाष्टकम्‌
कृष्ण जन्माष्टमी पर्व 

भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं
स्वभक्त-चित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्‌।
सुपिच्छ-गुच्छ-मस्तकं सुनाद-वेणुहस्तकं
ह्यनंग-रंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्‌॥1॥
मनोजगर्वमोचनं विशाल-लोल-लोचनं
विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्‌।
करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं
महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम्‌॥2
कदम्बसूनुकुण्डलं सुचारु-गण्ड-मण्डलं
व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्‌।
यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया
युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्‌॥3॥
सदैव पादपंकजं मदीयमानसे निजं
दधानमुत्तमालकं नमामि नन्दबालकम्‌।
समस्त-दोष-शोषणं समस्तलोकपोषणं
समस्तगोपमानस नमामि कृष्णलालसम्‌॥4॥
भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं
यशोमतीकिशोरकं नमामि दुग्धचोरकम्‌।
दृगन्तकान्तभंगिनं सदासदालसंगिनं
दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम्‌॥5॥
गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपावरं
सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनम्‌।
नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटं
नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम्‌॥6
समस्तगोपनंदनं हृदम्बुजैकमोहनं
नमामि कुंजमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम्‌।
निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं
रसालवेणुगायकं नमामि कुंजनायकम्‌।7॥
विग्दध-गोपिकामनो-मनोज्ञ-तल्पशायिनं
नमामि कुंजकानने प्रवृद्ध-वह्नि-पायिनम्‌।
यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा
मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्‌।
प्रमाणिकाष्टकद्वय जपत्यधीत्य यः पुमान्‌
भवेत्‌ स नन्द-नन्दने भवे भवे सुभक्तिमान्‌॥8॥
॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम्‌ ॥

॥ श्रीकृष्ण चालीसा ॥

॥ श्रीकृष्ण चालीसा ॥
 दोहा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुणअधरजनु बिम्बफल, नयनकमलअभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज
जय यदुनंदन जय जगवंदन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नट-नागर, नाग नथइया॥
कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ।
होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे।
कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे।
छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्‌यो।
अका बका कागासुर मार्‌यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला।
भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्‌यो रिसाई।
मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो।
गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।
चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्‌यो।
कंसहि केस पकड़ि दै मार्‌यो॥
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।
उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो।
मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी।
लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा।
जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्‌यो।
भक्तन के तब कष्ट निवार्‌यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्‌यो।
तंदुल तीन मूंठ मुख डार्‌यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।
लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।
भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।
शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।
उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।
दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।
बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया।
डूबत भंवर बचावइ नइया॥
'
सुन्दरदास' आस उर धारी।
दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।
बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥
दोहा
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥ 

जन्माष्टमी (Janmashtami)

 जन्माष्टमी (Janmashtami)

Janmashtami celebrates the birth of one of the most famous Gods of Hindu religion, Bhagwan Krishna, on the eighth day (Ashtami) in the month of Sravana or Savana. Lord Sri Krishna was born on the 'Rohini' nakshatram (star). It is generally celebrated in the month of August-September according to the Christian Calendar. Legend has it that Sri Krishna was born on a dark, stormy and windy night to end the rule and atrocities of his maternal uncle, Kansa.

Position of Stars at the time of Birth

It was only on the eighth day of the second fortnight, in the month of Sravana when, the moon entered the house of Vrishabha in Rohini Nakshatra (star) that Lord appeared. According to Barhapatyamana, the month of Sravana corresponds to the month of Bhadrapada Krishnapaksha. Lord was born in the year of Visvavasu, appx. 5,227 years ago.

Celebrated for over Two Days

Janmashtami is celebrated for over two days as “Rohini” nakshatra and Ashtami may not fall on the same day. The first day known as Krishnashtami, as the birth of Bhagwan Krishna falls on the eighth day after Raksha Bandhan, which generally falls in the month of August. The second day is known as Kalashtami.

Welcome the Lord at Midnight

It is only at midnight between the first and the second day that birth of Sri Krishna took place. The actual festivities begin during midnight in this 48 hour period. The celebration reaches its peak at midnight, with the birth of Lord Krishna, with lot of hymns, arti taking place and blowing of the Conch (shankh), rocking the cradle of Lord. The idol of lord is bathed with Panchamrit (A mixture of milk, ghee, oil, honey and Gangajal). The Panchamrit is later distributed as Prasad to the devotees along with other sweets. While some Fast on the first day and break it at midnight for others the fasting continues for both days. The period coin
cides with rainy season.